11वीं सदी की अनमोल धरोहर 100 साल बाद भारत वापस, नीदरलैंड के फैसले पर PM मोदी ने जताई ख़ुशी!

11वीं सदी की अनमोल धरोहर 100 साल बाद भारत वापस,

करीब एक सदी बाद भारत कि एक एतिहासिक और बेशकीमती सांस्कृतिक धरोहर आखिरकार अपने देश वापस लौट आई हैं| नीदरलैंड ने 11वीं सदी से जुड़ी एक दुर्भल विरासत भारत को सौंप दी हैं| इस महत्वपूर्ण वापसी पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने ख़ुशी जताते हुए इसे भारतीय संस्कृति और विरासत के सम्मान का बड़ा क्षण बताया हैं| देशभर में इस खबर को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा हैं, क्योंकि यह केवल एक पुरानी वस्तु की वापसी नहीं बल्कि भारत की एतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव से जुड़ा मामला माना जा रहा हैं|

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क्या हैं पूरी घटना?

जानकारी के अनुसार नीदरलैंड की सरकार और सांस्कृतिक संस्थानों की मदद से भारत को 11वीं सदी की एक दुर्लभ धरोहर वापस सौंपी गई हैं| यह धरोहर कई दशक पहले भारत से बाहर चली गई थी और लंबे समय से विदेश में संरक्षित थी| विशेषज्ञों का मानना हैं कि यह विरासत भारतीय इतिहास, कला और धार्मिक संस्कृति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं|

बताया जा रहा हैं कि इस धरोहर का संबंध दक्षिण भारत की प्राचीन कला परंपरा से हैं| इसकी बनावट नक्काशी और एतिहसिक महत्व को देखते हुए इसे अत्यंत दुर्लभ माना जा रहा हैं| इतिहासकारों का कहना हैं कि इस तरह की कलाकृतियाँ उस दौर की सांस्कृतिक समृद्धि और शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं|

प्रधानमंत्री मोदी ने जताई ख़ुशी:-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस धरोहर की वापसी पर ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत दुनिया भर में सम्मान का विषय हैं और खोई हुई धरोहरों की वापसी देश के लिए गर्व का पल हैं|

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उन्होंने कहा कि भारत लगातार दुनिया के विभिन्न देशों के साथ मिलकर अपनी एतिहासिक धरोहरों को वापस लाने की दिशा में काम कर रहा हैं| प्रधानमंत्री ने इस प्रयास में सहयोग देने के लिए नीदरलैंड का भी आभार व्यक्त किया हैं|

सोशल मिडिया पर भी प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया तेजी से वायरल हो रही हैं| कई लोगों ने इसे भारत की सांस्कृतिक जीत बताया हैं|

क्यों खास हैं यह धरोहर?

विशेषज्ञों के मुताबित 11वीं सदी का समय भारतीय कला और मंदिर स्थापत्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता हैं| उस दौर में बनाई गई मूर्तियाँ और धातु कलाकृतियाँ अपनी बारीक नक्काशी और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध थीं|

भारत लौटी यह धरोहर भी उसे एतिहासिक काल से जुड़ी बताई जा रही हैं| इतिहासकारों का मानना हैं कि इस तरह की विरासत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि कला और इतिहास के अध्ययन के लिए भी बहुत अहम होती हैं|

यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों को भारत की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक समृद्धि के बारे में जानने का अवसर देगी|

कैसे पहुंची थी विदेश?

पिछले कई दशकों में भारत की कई प्राचीन मूर्तियाँ और एतिहासिक बस्तुएं चोरी या अवैध तस्करी के जरिए विदेश पहुँच गई मामलों में इन्हें निजी संग्रहालयों या कला संग्राहकों के पास पाया गया|

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सरकार और विभिन्न जांच एजेंसियां लंबे समय से एसी धरोहरों को वापस लाने के प्रयास कर रही हैं| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और क़ानूनी प्रक्रियाओं के जरिए अब तक कई एतिहासिक वस्तुएं भारत लौट चुकी हैं|

विशेषज्ञों का कहना हैं कि सांस्कृतिक विरासत की चोरी केवल आर्थिक नुकसान नहीं बल्कि देश की पहचान और इतिहास को नुकसान पहुँचाने जैसा हैं|

भारत की बढ़ती वैश्विक पहल:-

पहल कुछ वर्षो में भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय पहल की हैं| कई देशों ने भारत के अनुरोध पर एतिहासिक वस्तुएं लौटाई हैं|

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अब नीदरलैंड जैसे देशों से भी भारत को कई महत्वपूर्ण धरोहरों वापस मिली हैं| इससे यह साफ़ होता हैं कि दुनिया अब सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और सही मालिकाना हक को लेकर अधिक गंभीर हो रही हैं|

विशेषज्ञों का मानना हैं कि यह केवल क़ानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि देशों के बीच सांस्कृतिक सम्मान और सहयोग का प्रतीक भी हैं|

लोगों में दिखा उत्साह:-

इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने ख़ुशी जाहिर की| कई यूजर्स ने लिखा कि भारत की खोई हुई धरोहरों को वापस लाना बेहद ज़रूरी हैं|

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कुछ लोगों ने कहा कि ऐसी एतिहासिक वस्तुएं सग्रहालयों में सुरक्षित रखी जानी चाहिए ताकि नई पीढ़ी देश के गौरवशाली इतिहास को करीब से समझ सके|

इतिहास और संस्कृति से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस पहल की सराहना की हैं| उनका कहना हैं कि सांस्कृतिक विरासत किसी भी राष्ट्र की पहचान होती हैं और उसे सुरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी हैं|

संग्रहालय में रखा जा सकता हैं:-

माना जा रहा हैं कि भारत लौटने के बाद इस धरोहर को किसी प्रमुख सग्रहालय में रखा जा सकता हैं ताकि लोग इसे देख सकें| इसके संरक्षण और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी|

विशेषज्ञों की टीम इसकी एतिहासिक और कलात्मक विशेषताओं का विस्तृत अध्ययन भी कर सकती हैं| इससे उस दौर की कला शैली और इतिहास के बारे में नई जानकारी मिलने की संभावना हैं|

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सांस्कृतिक विरासत का महत्व:-

भारत दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक माना जाता हैं| यहाँ की कला, संस्कृतिक और धार्मिक परंपराए सदियों पुरानी हैं| मंदिरों, मूर्तियों और एतिहासिक धरोहरों में भारत की समृद्ध विरासत की झलक दिखाई देती हैं|

एसी धरोहरों की वापसी केवल एक वस्तु की वापसी नहीं बल्कि देश की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा विषय माना जाता हैं| यही वजह हैं कि लोग इस खबर को गर्व और सम्मान के साथ देख रहे हैं|

निष्कर्ष:-

करीब 100 साल बाद  नीदरलैंड से भारत लौंटी 11वीं सदी की यह बेशकीमती धरोहर देश के लिए गर्व का क्षण हैं| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि पर ख़ुशी जताई हैं| यह घटना केवल एतिहासिक महत्व नहीं रखती बल्कि यह दिखाती हैं कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान और विरासत को सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहा हैं|

आने वाले समय में उम्मीद की जा रही हैं कि भारत की और भी कई खोई हुई धरोहरें वापस लौटेंगी और देश की सांस्कृतिक विरासत और मजबूत होगी|

 

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