भारत-बांग्लादेश संबंध: क्या आपसी मनमुटाव खत्म कर एक-दुसरे के करीब

नई दिल्ली/ढाका: दक्षिण एशिया की राजनीति में भारत और बांग्लादेश के संबंध हमेशा से ही चर्चा का विषय रहे हैं| एतिहासिक रूप से 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़े इन दोनों देशों के बीच के रिश्ते कभी ‘स्वर्ण युग’ की तरह चमकते हैं, तो कभी कुटनीतिक गलियारों में मनमुटाव की धुल ज्म जाती हैं| हाल के घटनाक्रमों और बदलती वैश्विक राजनीति के बीच आज सबसे बड़ा सवाल यही हैं कि क्या दोनों पड़ोसी अपने मतभेदों को पीछे छोडकर एक नई और मजबूत साझेदारी की ओर कदम बढ़ा पाएंगे|
एतिहासिक गहराई और वर्तमान चुनौतियाँ:-
भारत और बांग्लादेश के बीच केवल सीमाएं ही नहीं जुड़ीं हैं, बल्कि साझा संस्कृति, भाषा और इतिहास भी एक-दुसरे को जोड़ता हैं| हालांकि, हाल के वर्षों में कुछ ऐसे मुद्दे उभरे हैं जिन्होंने रिश्तों में थोड़ी खटास पैदा की हैं:
- तीस्ता जल विवाद:- जल बटवारा हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा हैं| तीस्ता नदी के पानी को लेकर कोई ठोस समझौता न हो पाना ढाका के लिए चिंता का विषय बना रहता हैं|
- सीमा प्रबंधन और सुरक्षा:- सीमा पर होने वाली घटनाओं और घुसपैठ को लेकर दोनों देशों के सुरक्षा बलों के बीच कभी-कभी तनाव देखा जाता हैं|
- बदलती सत्ता और आंतरिक राजनीति:- बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में होने वाले बदलावों का असर अक्सर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ता हैं| राजनीतिक स्थिरता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चर्चा में रहते हैं|
आर्थिक साझेदारी: एक नई उम्मीद:-
मनमुटाव के बावजूद, आर्थिक आंकड़े एक अलग ही कहानी बया करते हैं| भारत, भंग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार हैं|
- कनेक्टिविटी:- रेल, सड़क और जलमार्गो के माध्यम से कनेक्टिविटी बढ़ाने पर दोनों देशों ने अभूतपूर्व काम किया हैं| चटगाँव और मंगला बंदरगाहों तक भारत की पहुँच ने व्यापार के नए रास्ते खोले हैं|
- ऊर्जा सहयोग:- मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट जैसे उपक्रम यह दर्शाते हैं कि दोनों देश एक-दुसरे की उर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबंद्ध हैं|
चीन का प्रभाव और कुटनीतिक संतुलन:-
बांग्लादेश के लिए भारत और चीन के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती हैं| जहाँ भारत एक ‘स्वाभाविक मित्र’ और सुरक्षा भागीदार हैं, वहीं चीन बुनियादी ढांचे और निवेश के मामले में एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा हैं| ढाका की ‘सभी के साथ दोस्ती, किसी के साथ दुश्मनी नहीं’ की नीति भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं|
विदेश मंत्रियों की मुलाकात: एक सकारात्मक संकेत:-
हाला ही में भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान के बीच हुई मुलाकात (जैसे कि चित्र में देखा जा सकता हैं) यह स्पष्ट करती हैं कि संवाद के द्वार कभी बंद नही हुए हैं| दोनों नेताओं के बीच ‘हैंडशेक’ केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस विश्वास को फिर से बहल करने की कोशिश हैं जो समय-समय पर डगमगाता रहा हैं|
भू-राजनीतिक शतरंज और ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर की सुरक्षा:-
भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा हैं| भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (Seven Sisters) को शेष भारत से जोड़ने वाला संकरा ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ या ‘चिकन नेक’, बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करता हैं|
- सुरक्षा सहयोग:- पिछले दशक में, ढाका ने भारत विरोधी उग्रवादी समूहों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर नई दिल्ली का भरोसा जीता हैं| यदि मनमुटाव बढ़ता हैं, तो सीमा पार से सुरक्षा चुनौतियाँ फिर से सिर उठा सकती हैं, जिसे दोनों ही देश वहन नहीं कर सकते|
- ट्रांजिट और ट्रांसशिपमेंट:- भारत अब बांग्लादेश के रास्ते अपने पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुँचाने के लिए पारगमन सुविधाओं का उपयोग कर रहा हैं| यह आर्थिक एकीकरण मनमुटाव को कम करने में ‘फेविकोल’ का काम करता हैं|
सांस्कृतिक कूटनीति: ‘सॉफ्ट पावर’ का प्रभाव:-
भारत और बांग्लादेश के बीच के रिश्ते केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं हैं| यह ‘पीपुल टू पीपुल’ यानी जनता के बीच का जुड़ाव हैं|
- साझा विरासत:- रबिन्द्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम दोनों देशों में समान रूप से पूजनीय हैं| संगीत, सिनेमा और क्रिकेट ऐसे माध्यम हैं जो राजनीति की कड़वाहट को कम करने की क्षमता रखते हैं|
- पर्यटन और चिकित्सा:- भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेशी नागरिकों का होता हैं, जो चिकित्सा और शिका के लिए भारत को प्राथमिकता देते हैं| यह आपसी निर्भरता रिश्तों को टूटने से बचाती हैं|
चुनौतियाँ जो अभी भी बरकरार हैं:-
मनमुटाव खत्म करने की राह में कुछ पुराने पत्थर अभी भी पड़े हैं:
- एनआरसी (NRC) और नागरिकता मुद्दा:- भारत में नागरिकता संबंधी कानूनों को लेकर बांग्लादेशी मीडिया और जनता में अक्सर चिंताएं देखि जाती हैं, जिसे कुटनीतिक बातचीत के जरिए सुलझाना ज़रूरी हैं|
- अल्पसंख्यकों की स्थिति:- दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के प्रति होने वाली घटनाओं का असर सीमाओं के पार महसूस किया जाता हैं, जो भावनात्मक रूप से रिश्तों को प्रभावित करता हैं|
- व्यापार घाटा:- हालांकि व्यापार बढ़ रहा हैं, लेकिन बांग्लादेश अक्सर भारत में अपने उत्पादों के लिए कम ‘नॉन-ट्रैफिक बाधाओं’ की मांग करता हैं ताकि व्यापार संतुलन बना रहे|
8. भविष्य का रोडमैप: 2026 और उससे आगे:-
आने वाले वर्षों में, दोनों देशो को ‘क्राम्पिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट’ (CEPA) की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा| यह समझौता न केवल व्यापार को बढ़ावा देगा, बल्कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को इस तरह जोड़ देगा कि ‘मनमुटाव’ करना आर्थिक रूप से नुकसानदेह साबित होगा|
क्या करीब आ सकेंगे?
इसका संक्षिप्त उत्तर यह हैं कि दोनों देशों के पास दूर रहने का विकल्प नहीं हैं| वैश्वीकरण के इस दौर में, दक्षिण एशिया की स्थिरता भारत और बांग्लादेश के ‘भाईचारे’ पर टिकी हैं| हाथ मिलाना (जैसा की चित्र में दिख रहा हैं) शुरुआत हैं, लेकिन दिलों को जोड़ने के लिए निरंतर विश्वास बहाली के उपायों (CBMs) की आवश्यकता होगी|
आगे की राह:-
क्या मनमुटाव खत्म होगा| इसका उत्तर ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच कहीं छुपा हैं| कूटनीति में कोई भी चीज स्थायी नहीं होती, लेकिन भूगोल को बदला नही जा सकता| भारत के लिए ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति में बांग्लादेश का स्थान सर्वोच्च हैं, और बांग्लादेश के विकास के लिए भारत का सहयोग अनिवार्य हैं|
