वोट नही दिया तो क्या मिलेगी सजा? सुप्रीम कोर्ट का एतिहासिक फैसला

लोकतंत्र और मतदान की शक्ति:-
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं| यहाँ ‘जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन’ की अवधारणा ही नींव हैं| इस नींव की सबसे बड़ी ईंट हैं ‘मतदान’ | हर 5 साल में जब देश में आम चुनाव या राज्यों में विधानसभा चुनाव होते हैं, तो हर नागरिक के पास अपनी सरकार चुनने की ताकत आती हैं| लेकिन क्या यह ताकत एक ‘अधिकार’ हैं या एक ‘कर्तव्य’ , क्या राज्य आपको अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर कर सकता हैं, ये सवाल दशकों से क़ानूनी और राजनीतिक गलियारों में गूंज रहे थे| हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इन सभी सवालों पर विराम लगा दिया हैं|
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1. क्या हैं ताजा मामला (The Legal Context):-
सुर्पिम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि भारत में “अनिवार्य मतदान” (Mandatory Voting) लागू किया जाए| याचिकाकर्ता का ट्रक था कि कम मतदान प्रतिशत के कारण ऐसी सरकारें चुन ली जाती हैं जिन्हें वास्तव में बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं होता| याचिका में सुझाव दिया गया कि जो लोग वोट नहीं देते, उन्हें सरकारी सुविधाओं, जैसे सब्सिडी, राशन या अन्य योजनाओं से बंचित किया जाए या उन पर आर्थिक जुर्माना लगाया जाए|
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख:-
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को न केवल ख़ारिज किया, बल्कि इस पर तीखी टिप्पणी भी की| कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के तहत वोट देना एक ‘वैधानिक अधिकार’ (Statutory Right) हैं, न की कोई क़ानूनी बाध्यता| कोर्ट ने कहा की किसी नागरिक को उसकी मर्जी के बिना पोलिंग बूथ तक खींचकर ले जाना लोकतंत्र की हत्या करने जैसा होगा|
2. भारतीय संविधान और मतदान का अधिकार (Constitutional Background):-
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत हर वयस्क नागरिक (18 वर्ष से ऊपर) को मताधिकार प्राप्त हैं| इसे ‘युनिवर्सल एडल्ट सफ्रेज’ कहा जाता हैं|
- अनुच्छेद 19(1) (a):- सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ (PUCL)बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि मतदाता के पास यह चुनने का अधिकार हैं की वह अपना वोट किसे दे, और इसमे ‘किसी को भी वोट न देने’ का अधिकार भी शामिल हैं|
- स्वतंत्र इच्छा:- लोकतंत्र में ‘असहमति’ (Dissent) का भी स्थान हैं| यदि कोई नागरिक व्यवस्था से खुश नही हैं और विरोध स्वरूप वोट नहीं डालना चाहता, तो यह उसकी अभिव्यक्ति का एक तरीका हैं|
3. दुनिया के अन्य देशों में क्या हैं स्थिति(Global Comparison):-
दुनिया के करीब 22-25 देशों में ‘अनिवार्य मतदान’ का नियम लागु हैं| इनमें से कुछ प्रमुख उदहारण निम्नलिखित हैं:
- ऑस्ट्रेलिया:- यहाँ मतदान करना क़ानूनी रूप से अनिवार्य हैं| यदि कोई नागरिक बिना किसी ठोस कारण के वोट नहीं देता, तो उसे करीब 20 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ता हैं| बार-बार ऐसा करने पर सजा और भी कड़ी हो सकती हैं|
- ब्राजील और अर्जेंटीना:- यहाँ भी वोट देना अनिवार्य हैं| वोट न देने पर पासपोर्ट बनवाने या सरकारी नौकरी पाने में दिक्कतें आती हैं|
- बेल्जियम:- बेल्जियम दुनिया के उन पहले देशों में से एक हैं जहाँ 1893 में ही अनिवार्य मतदान लागू कर दिया गया था|
भारत में इसे लागू क्यों नहीं किया जा सकता:-
भारतीय विधि आयोग (Law Commission) ने अपनी कई रिपोर्टो में कहा हैं कि भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में अनिवार्य मतदान व्यावहारिक नहीं हैं| भारत में करोड़ो लोग प्रवासी मजबूर हैं जो काम के सिलसिले में अपने घर से दूर रहते हैं| उनके लिए वोट देने गांव जाना आर्थिक रूप से बोझिल हो सकता हैं| ऐसे में उन पर जुर्माना लगाना ‘दोहरी मार’ जैसा होगा|
4. नोटा (NOTA) – एक मौन क्रांति:-
अनिवार्य मतदान की बहस में ‘नोटा’ (None of the Above) का जिक्र होना लाजिमी हैं| 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारत में नोटा की शुरुआत हुई|
- नोटा का उद्देश्य:- यह उन लोगों के लिए हैं जो चुनाव में खड़े सभी प्रत्याशियों को ख़ारिज करना चाहते हैं|
- कोर्ट का तर्क:- कोर्ट का मानना हैं कि जब हमारे पास नोटा जैसा विकल्प हैं, तो यह कहना गलत हैं कि लोग जागरूक नही हैं| यदि कोई व्यक्ति नोटा भी नही दबाना चाहता और घर बैठना चाहता हैं, तो उसे इसकी आजादी मिलनी चाहिए|
5. क्यों कम होता हैं मतदान प्रतिशत (Root Causes of Voter Apathy):-
भारत में औसतन 60% से 70% मतदान होता हैं| बाकी 30% लोग क्यों नहीं आते, इसके कई कारण हैं:
- राजनीतिक निराशा:- लोगों को लगता हैं कि कोई भी पार्टी आए, उनके जीवन में बदलाव नहीं आएगा|
- दुरी और पलायन:- करोड़ो भारतीय अपने गृह क्षेत्र से बाहर काम करते हैं| उनके लिए वोटिंग के दिन छुट्टी लेकर जाना संभव नहीं होता|
- वोटर लिस्ट की खामियां:- कई बार नाम कट जाने या गलत जानकारी के कारण भी लोग वोट नही दे पाते|
- सुरक्षा की चिंता:- कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में हिंसा के डर से लोग घर से बाहर नहीं निकलते|
6. अनिवार्य मतदान के पक्ष और विपक्ष में ट्रक पक्ष में ट्रक (Arguments For):-
- पूर्ण प्रतिनिधित्व:- इससे चुनी हुई सरकार को सही मायने में ‘जनता की सरकार’ कहा जा सकेगा|
- जागरूकता में वृद्धि:- जुर्माने के डर से ही सही, लोग उम्मीदवारों के बारे में पढ़ना शुरू करेंगे|
- पैसे की बचत:- जब लोग खुद आएंगे, तो पार्टियों को उन्हें लाने-ले जाने के लिए गैर-क़ानूनी खर्च नहीं करना पड़ेगा|
विपक्ष में तर्क (Arguments Against):-
- लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ:- जबरदस्ती कराया गया मतदान ‘फ्री एंड फेयर’ नहीं हो सकता|
- अनपढ़ और अनजान मतदाता:- मज़बूरी में वोट देने वाला व्यक्ति किसी के भी बहकावे में आकर या बिना सोचे-समझे बटन दबा सकता हैं|
- प्रशासनिक बोझ:- करोड़ो लोगो को ट्रैक करना और उन पर जुर्माना वसूलना पुलिस और कोर्ट के लिए असंभव कार्य होगा|
7. चुनाव आयोग की पहल: जागरूकता बनाम सजा:-
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने हमेशा ‘सजा’ की जगह ‘जागरूकता’ का रास्ता चुना हैं|
- SVEEP कार्यक्रम:- एक्से जरिए स्कूलों, कॉलेजों और सोशल मीडिया पर मतदान के महत्व को समझाया जाता हैं|
- दिग्गजों का सहारा:- सचिन तेंदुलकर, एम.एस. धोनी और पंकज त्रिपाठी जैसे सितारों को ‘नेशनल आइकॉन’ बनाकर युवाओं को प्रेरित किया जाता हैं|
- सुविधाएँ:- अब बुजुर्गो और दिव्यंगों के लिए ‘घर से वोट’ (Vote from Home) की सुविधा भी शुरू की गई हैं|
8. आम नागरिक के लिए इस फैसले का क्या मतलब हैं:-
अगर आप एक आम नागरिक हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का आपके जीवन पर सीधा असर पड़ता हैं:
- कोई डर नहीं:- आपके ऊपर कोई पुलिस केस नहीं होगा यदि आप वोट नहीं देते|
- सरकारी लाभ सुरक्षित:- आपकी सब्सिडी, राशन कार्ड या बैंक खाते पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा|
- वैधानिक सुरक्षा:- आपकी ‘निजता’ और ‘चुप रहने का अधिकार’ सुरक्षित हैं|
9. क्या भविष्य में कानून बदल सकता हैं:-
भारत में कानून संसद द्वारा बनाए जाते हैं| हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी इसे ख़ारिज कर दिया हैं, लेकिन यदि भविष्य में संसद, ‘अनिवार्य मतदान विधेयक’ पारित करती हैं, तो स्थिति बदल सकती हैं| लेकिन, विशेषज्ञों ढांचे’ (Basic Structure Doctrine) का उल्लंघन माना जा सकता हैं, जिसे कोर्ट रद्द कर सकता हैं|
