गाजीपुर के लाल का अंतिम विदाई: कैप्टन प्रशांत चौरसिया पंचतत्व में विलीन,

गाजीपुर, उत्तर प्रदेश: 25 मार्च 2026
उत्तरप्रदेश के वीर सपूत और भारतीय सेना के जांबाज अधिकारी कैप्टन प्रशांत चौरसिया आज पंचतत्व में विलीन हो गए| गाजीपुर जिले के लाल का अंतिम संस्कार पुरे सैन्य सम्मान के साथ उनके पैतृक घाट पर किया गया| हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़, नम आँखें और देशभक्ति के नारों के बीच इस वीर योद्धा को अंतिम विदाई दी गई|
देहरादून में एक सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास के दौरान अपने साथी की जान बचाते हुए शहीद हुए कैप्टन प्रशांत का पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक गांव पहुंचा, तो माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया| ‘कैप्टन प्रशांत अमर रहें’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा|
शहादत की वीरतापूर्ण कहानी:-
कैप्टन प्रशांत चौरसिया भारतीय सेना की कुमाऊं रेजिमेंट में तैनात थे| जानकारी के अनुसार, घटना उत्तराखंड के देहरादून क्षेत्र में एक कठिन युद्धाभ्यास के दौरान हुई| एक तकनीकी खराबी और आकस्मिक दुर्घटना की स्थिति में, प्रशांत ने अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए अपने साथी सैनिकों को सुरक्षित स्थान पर धकेला, लेकिन इस प्रक्रिया में वे स्वयं गंभीर रूप से घायल हो गए| अस्पताल ले जाते समय इस वीर योद्धा ने अंतिम सांस ली|
अंतिम यात्रा: जनसैलाब और देशभक्ति का जज्बा:-
प्रशांत का पार्थिव शरीर सेना के विशेष वाहन से उनके घर लाया गया| उनके घर से श्मशान घाट तक की 5 किलोमीटर की दुरी तय करने में घंटों लग गए, क्योंकि सड़क के दोनों ओर हजारों लोग अपने नायक के अंतिम दर्शन के लिए खड़े थे| युवाओं ने तिरंगा झंडा लेकर मोटरसाईकिल रैली निकाली और पुष्प वर्षा की|
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सैन्य सम्मान और राजकीय विदाई:-
घाट पर सेना के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया और मातमी धुन बजाई| उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि और स्थानीय प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारीयों ने पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजली दी| सेना के अधिकारीयों ने तिरंगा उनके पिता को सौंपा, जो एक भावुक कर देने वाला क्षण था| उनके छोटे भाई ने मुखाग्नि दी|
परिवार और गांव का गौरव:-
कैप्टन प्रशांत के पिता ने गर्व से कहा, “मेरा बेटा देश के काम आया, इससे बड़ा गौरव एक पिता के लिए और क्या हो सकता हैं|” प्रशांत बचपन से ही मेधावी थे और उनका एकमात्र सपना भारतीय सेना में सेवा करना था| उनके मित्रों ने उन्हें एक हंसमुख और हमेशा दूसरों की मदद करने वाला इंसान बताया|
बचपन का अटूट संकल्प और एनसीसी (NCC) का सफर:-
प्रशांत के मित्रों और शिक्षकों के अनुसार, वे बचपन से ही सेना की वर्दी के प्रति आकर्षित थे| स्कुल के दिनों में वे एनसीसी के कैडेट रहे और हमेशा अनुशासन में रहते थे| उन्होंने गाजीपुर के स्थानीय कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और पहले ही प्रयास में सीडीएस (CDS) की परीक्षा पास कर भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून में प्रवेश पाया था| उनका जीवन संघर्ष उन युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं|
शहादत के क्षण की विस्तृत वीरता:-
सैन्य सूत्रों के हवाले से यह जानकारी मिली हैं कि जिस समय अभ्यास चल रहा था, अचानक एक ब्लास्ट या तकनीकी खराबी के कारण उनके साथी जवान का जीवन खतरे में था| कैप्टन प्रशांत ने बिना एक सेकंड गंवाए अपने साथी को सुरक्षित खाई में धकेला| इस प्रक्रिया में वे स्वयं मलबे या विस्फोट की चपेट में आ गए| सेना के उच्च अधिकारीयों ने उनकी इस त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और निस्वार्थ भाव को ‘सर्वोच्च बलिदान’ की श्रेणी में रखा हैं|
गांव की बेटियों और युवाओं के प्रेरणास्रोत:-
प्रशांत केवल एक अधिकारी नहीं थे, बल्कि अपने गांव ‘भावारकोल’ (या संबंधित क्षेत्र) के युवाओं के मेंटर भी थे| छुट्टियों में घर आने पर वे गांव के मैदान में दौड़ने वाले लड़कों को सेना में भर्ती होने के टिप्स देते थे| उनके निधन की खबर सुनकर न केवल उनके घर बल्कि आसपास के 10 गाँवों के चूल्हे नहीं जले| गांव की बेटियों ने उन्हें अपना ‘रक्षक भाई’ बताते हुए भावभीनी विदाई दी|
अधूरी रह गई शादी की रस्में:-
पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, कैप्टन प्रशांत कु शादी की चर्चाएँ घर में चल रही थीं| अगले कुछ महीनों में उनकी सगाई होने वाली थी और परिवार उनके स्वागत की तैयारियों में जुटा था| घर की महिलाएं उनके लिए मंगल गीत गाने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था| सेहरा बाँधने की उम्र में वे तिरंगे में लिपटकर घर आए, जिसने हर देखने वाले की आँखे नम कर दीं|
प्रशासनिक घोषणाएं और स्मृति द्वार:-
अंतिम संस्कार के समय उपस्थिति प्रभारी मंत्री और जिलाधिकारी ने घोषणा की हैं कि शहीद कैप्टन प्रशांत चौरसिया की स्मृति में गांव की मुख्य सड़क का नाम उनके नाम पर रखा जाएगा| हाथ ही, जिले के एक प्रमुख चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया हैं ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उनके बलिदान को याद रख सकें| स्थानीय खेल मैदान का नामकरण भी उनके नाम पर करने की मांग उठी हैं|
निष्कर्ष: अमर बलिदान की अमिट गाथा:-
कैप्टन प्रशांत चौरसिया का बलिदान केवल गाजीपुर जिले के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक ऐसी क्षति हैं जिसकी भरपाई असंभव हैं| एक जांबाज सैन्य अधिकारी के रूप में उन्होंने ‘सेवा परमो धर्मः’ के आदर्श वाक्य को चरितार्थ करते हुए अपने साथी की जान बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी| वीर प्रसूता धरती गाजीपुर ने एक बार फिर साबित कर दिया हैं कि जब भी देश की आन-बाण और शान पर आंच आती हैं, यहाँ के लाल अपनी छाती तानकर खड़े हो जाते हैं|
प्रशांत आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, अनुशासन और मातृभूमि के प्रति उनका अटूट प्रेम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मशाल का काम करेगा| तिरंगे में लिप्त उनका पार्थिव शरीर और ‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी नारे इस बात के गवाह हैं कि एक सैनिक कभी मरता नहीं, वही अपनी शहादत से अमर हो जाता हैं|
प्रशासन और सरकार द्वारा की गई घोषणाएं परिवार की आर्थिक मदद तो कर सकती हैं, लेकिन उस सूनेपन को नहीं भर सकतीं जो प्रशांत के जाने से पैदा हुआ हैं| आज पूरा देश और हमारा न्यूज पोर्टल इस वीर सपूत को कोटि-कोटि नमन करता हैं| कपतं प्रशांत चौरसिया का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा और उनकी वीरता की कहानियां हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेंगी|
शहीद कैप्टन प्रशांत चौरसिया अमर रहें! जय हिंद, जय भारत|
