अटूट गठबंधन: इसरायल और अमेरिका की ‘अजेय’ दोस्ती का पूरा सच!

अटूट गठबंधन: इसरायल और अमेरिका की

"Israel America Strategic Meeting Donald Trump Netanyahu"

वाशिंगटन/यरूशलेम: दुनिया के नक्शे पर जब भी युद्ध की आहट होती हैं, तो दो देशों का नाम सबसे पहले एक साथ लिया जाता हैं- अमेरिका और इसरायल| कई लोग इसे केवल राजनीति मानते हैं, तो कुछ इसे एक गहरा रणनीतिक रिश्ता| लेकिन क्या आपने कभी सोचा हैं कि हजारों मील की दुरी होने के बावजूद, युद्ध के मैदान में ये दोनों देश हमेशा एक ही मोर्चे पर क्यों खड़े नजर आते हैं?

आईए जानते हैं इस ‘सुपरपावर’ और ‘मिडिल ईस्ट के शेर’ की दोस्ती के पीछे की असली कहानी|

1. साझा लोकतांत्रिक मूल्य (Democratic Values)

अमेरिका और इसरायल के बीच संबंधों की सबसे बड़ी नींव ‘लोकतंत्र’ हैं| मध्य पूर्व (Middle East) के इलाके में, जहा अधिकतर देशों में राजशाही या तानाशाही रही हैं, इसरायल खुद को एक मजबूत लोकतांत्रिक देश के रूप में पेश करता हैं| अमेरिका खुद को ‘लोकतंत्र का रक्षक’ मानता हैं, इसलिए वह इसरायल को अपना स्वाभाविक साथी देखता हैं|

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2. सुरक्षा और ख़ुफ़िया जानकारी का आदान-प्रदान 

युद्ध के समय इसरायल और अमेरिका के एक साथ होने का सबसे बड़ा कारण इंटेलिजेंस शेयरिंग हैं| इसरायल की ख़ुफ़िया एजेंसी ‘मोसाद’ को दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसियों में गिना जाता हैं| इसरायल अमेरिका को मध्य पूर्व की पल-पल की खबर देता हैं, और बदले में अमेरिका इसरायल को अत्याधुनिक हथियार और अरबों डॉलर की सैन्य सहायता (F-35 जैसे लड़ाकू विमान) प्रदान करता हैं|

3. ‘आयरन डोम’ और तकनीकी सहयोग 

इसरायल का प्रसिद्ध डिफेंस सिस्टम ‘आयरन डोम’ अमेरिका के वित्तीय सहयोग के बिना अधुरा होता| दोनों देश मिलकर मिसाईल डिफेंस और साइबर सुरक्षा पर काम करते हैं| जब भी इसरायल पर हमला होता हैं, अमेरिका उसे सैन्य मदद इसलिए देता हैं ताकि उसके द्वारा निवेश की गई तकनीक और रणनीतिक पकड़ सुरक्षित रहे|

4. अमेरिका में ‘इसरायल लॉबी’ का प्रभाव 

अमेरिका की घरेलू राजनीति में इसरायल समर्थक समूहों (जैसे AIPAC) का बहुत बड़ा प्रभाव हैं| अमेरिका में रहने वाले यहूदी समुदाय के लोग आर्थिक और राजनीतिक रूप से बहुत मजबूत हैं| कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति या नेता इस वोट बैंक और समर्थन को खोना नहीं चाहता, इसलिए वे हर परिस्थिति में इसरायल के साथ खड़े दीखते हैं|

5. रणनीतिक जरूरत: ‘मिडिल ईस्ट का गेटवे’

अमेरिका के लिए इसरायल मध्य पूर्व में एक ऐसे ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’ (कभी न डूबने वाले युद्धपोत) की तरह हैं, जो उस क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा करता हैं| ईरान जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका को इसरायल की उतनी ही जरूरत हैं, जितनी इसरायल को अमेरिका के समर्थन की|

6. हथियारों का परिक्षण और ‘बैटल-टेस्टेड’ तकनीक 

इसरायल और अमेरिका के बीच एक गहरा सैन्य-औद्योगिक समझौता हैं| अमेरिका इसरायल को आधुनिक हथियार देता हैं, और इसरायल उन्हें युद्ध की वास्तविक स्थितियों में आजमाता हैं| इस ‘बैटल-टेस्टेड’ फीडबैक से अमेरिका को अपने हथियरों (जैसे मिसाईल डिफेंस सिस्टम और ड्रोंस) को सुधारने में बड़ी मदद मिलती हैं| युद्ध के समय अमेरिका का साथ देना, असल में अपनी ही तकनीक को और बेहतर बनाने का एक जरिया भी हैं|

7. ईरान: साझा ‘साझा दुश्मन’ का मुकाबला 

मध्य पूर्व की राजनीतिक में ईरान एक ऐसा देश हैं जिदे अमेरिका और इसरायल दोनों ही अपने अस्तित्व और हितों के लिए खतरा मानते हैं| ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने और उसके बढ़ते प्रभाव को कुचलने के लिए दोनों देश एक ही मोर्चे पर आ जाते हैं| युद्ध की स्थिति में अमेरिका का इसरायल के साथ होना, दरअसल ईरान को यह कड़ा संदेश देना होता हैं कि क्षेत्र में उसकी दादागिरी नही चलेगी|

8. इंटेलिजेंस और काउंटर-टेररिज्म (आतंकवाद विरोधी अभियान)

इसरायल के पास दुनिया का सबसे सघन जासूसी नेटवर्क हैं| अमेरिका के लिए दुनिया भर में फैले कट्टरपंथी संगठनों और आतंकी नेटवर्क की जानकारी जुटाने में इसरायल एक ‘आँख और कान’ की तरह काम करता हैं| युद्ध के समय, अमेरिका इसरायल की ख़ुफ़िया जानकारी पर बहुत अधिक निर्भर रहता हैं, इसीलिए वह सैन्य रूप से इसरायल की पीठ थपथपाता रहता हैं|

9. संयुक्त राष्ट्र (UN) में ‘सुरक्षा कवच’

जब भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों या संयुक्त राष्ट्र में इसरायल के खिलाफ कोई प्रस्ताव आता हैं, तो अमेरिका अपनी ‘वीटो पावर’ (Veto Power) का इस्तेमाल करके उसे बचा लेता हैं| युद्ध के दौरान जब दुनिया इसरायल पर दबाव बनाती हैं, तब अमेरिका एक राजनीतिक ढाल बनकर खड़ा हो जाता हैं| यह कुटनीतिक साथ ही हैं जो इसरायल को सैन्य कर्रवाई करने की हिम्मत देता हैं|

10. आर्थिक निवेश और स्टार्टअप नेशन का साथ 

इसरायल को दुनिया का ‘स्टार्टअप नेशन’ कहा जाता हैं| सिलिकान वैली (अमेरिका) की लगभग हर बड़ी टेक कंपनी (जैसे Google, Intel, Microsoft) का इसरायल में बड़ा निवेश और रिसर्च सेंटर हैं| अगर इसरायल युद्ध में असुरक्षित होता हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यस्था और तकनीकी कंपनियों को अरबो डॉलर का नुकसान हो सकता हैं| अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भी अमेरिका युद्ध में इसरायल का पुरजोर समर्थन करता हैं|

मुख्य बिंदु: यह दोस्ती केवल इतिहास की नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक दबदबे की कहानी हैं| जहाँ अमेरिका ‘पावर’ हैं, वहीं इसरायल ‘रणनीति’ का केंद्र|

एक अटूट ‘चक्रव्यूह’:-

इसरायल और अमेरिका के बीच का यह रिश्ता महज एक समझौता नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘रणनीतिक चक्रव्यूह’ हैं जिसे तोड़ पाना फिलहाल नामुमकिन दीखता हैं| जहा अमेरिका को मध्य-पूर्व (Middle East) में अपने पैर जमाने के लिए इसरायल जैसे एक भरोसेमंद और शक्तिशाली ‘किले’ की जरूरत हैं, वहीं इसरायल को दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत का हाथ अपने कंधे पर चाहिए| युद्ध की तपिश में इन दोनों देशों का एक साथ आना यह साफ संदेश देता हैं कि दुनिया की राजनीति की दिशा आज भी इन दो महाशक्तियों के आपसी तालमेल से तय होती हैं| यह दोस्ती आने वाले दशकों में भी वैश्विक शांति और युद्ध के समीकरणों को प्रभावित करती रहेगी|

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