दिल्ली की राजनीति में आज का सूर्योदय एक नई उम्मीद लेकर आया हैं| पिछले दो वर्षों से जिस ‘शराब नीति घोटाले’ (Liquor Policy Case) ने देश की राजधानी की राजनीति को अपनी गिरफ्त में ले रखा था, आज उस पर न्यायपालिका का अंतिम और निर्णायक मुहर लग गई है| दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने एक एतिहासिक फैसला सुनाते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और पार्टी के अन्य सहयोगियों को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी (Discharge) कर दिया हैं|
यह फैसला न केवल एक क़ानूनी जीत हैं, बल्कि अरविंद केजरीवाल के उस ‘कट्टर ईमानदार’ होने के दावे पर भी मुहर हैं, जिसे विपक्षी दल लगातार चुनौती दे रहे थे|
कोर्ट का विस्तृत फैसला: “हवा-हवाई दावों पर नही चलता कानून”
आज सुबह कोर्ट रूम नंबर 502 में जब विशेष न्यायाधीश ने अपना 450 पन्नों का फैसला पढ़ना शुरू किया, तो वहां सन्नाटा पसर गया| अदालत ने जाँच एजेंसी सीबीई (CBI) और ईडी (ED) की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए|
अदालत के फैसले के 3 मुख्य स्तंभ:
- मनी ट्रेल का अभाव: कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि एजेंसी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही हैं कि कथित 100 करोड़ रूपये की रिश्वत कहा गई| बिना किसी ठोस ‘मनी ट्रेल’ के किसी व्यक्ति को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं माना जा सकता|
- गवाहों के विरोधाभासी बयान: अदालत ने पाया कि जिन सरकारी गवाहों (Approvers) के बयानों पर पूरी केस की नींव टिकी थी, उनके बयानों में भारी विरोधाभास था| कोर्ट ने कहा कि दबाव में दिए गए बयानों को साक्ष्य नहीं माना जा सकता|
- नीति निर्माण का अधिकार: जज ने टिप्पणी की कि “एक चुनी हुई सरकार को अपनी आबकारी नीति बनाने का संवैधानिक अधिकार हैं| जब तक यह साबित न हो कि व्यक्तिगत लाभ के लिए नीति बदली गई, तब तक इसे अपराध नहीं माना जा सकता|”
भावुक क्षण: केजरीवाल और सिसोदिया के आँसू
अदालत का फैसला आते ही केजरीवाल और मनीष सिसोदिया एक-दुसरे के गले लग गए| बाहर निकलते ही मिडिया के कैमरों के सामने केजरीवाल की आँखों में आँसू थे| उन्होंने एक लंबी साँस ली और कहा:
“पिछले डॉ साल हमारे लिए किसी नर्क से कम नहीं थे| हमें देशद्रोही और छोर कहा गया| लेकिन आज बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की जीत हुई हैं| यह जीत उन लाखों बच्चों की हैं जिनकी शिक्षा के लिए मनीष सिसोदिया ने दिन-रात एक किया था| आज साबित हो गया कि सत्य परेशान हो सकता हैं, लेकिन पराजित कभी नहीं होता|”
मनीष सिसोदिया ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह शिक्षा क्रांति को रोकने की एक नाकाम कोशिश थी, लेकिन अब हम दोगुनी शक्ति से काम करेंगे|
राजनीतिक मायने: 2029 की चुनावी बिसात और ‘इंडिया’ गठबंधन
इस फैसले का असर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा| यह राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को भी बदलने वाला हैं:
- केजरीवाल का बढ़ता कद: अब केजरीवाल एक ‘विक्टिम’ (पीड़ित) की छवि से बाहर निकलकर एक ‘विजेता’ के रूप में उभरेंगे| भ्रष्टाचार के आरोपों का दाग धुलने से उनकी स्वीकार्यता मध्य वर्ग और युवाओं के बीच फिर से बढ़ेगी|
- विपक्ष की घेराबंदी: बीजेपी के लिए यह एक बड़ा झटका हैं, क्योंकि उसने केजरीवाल की गिरफ्तारी को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था| अब ‘इंडिया’ (India) गठबंधन के नेता केजरीवाल के इर्द-गिर्द और अधिक मजबूती से लामबंद होंगे|
- संगठनात्मक मजबूती: पिछले कुछ समय से आप (AAP) के कार्यकर्ता क़ानूनी पचड़ों के कारण बैकफुट पर थे| अब पार्टी पुरे देश में ‘ईमानदारी उत्सव’ मनाकर अपना शक्ति प्रदर्शन करेगी|
दिल्ली की जनता की आवाज: ग्राउंड रिपोर्ट
दिल्ली की गलियों, मोहल्लों और मेट्रो स्टेशनों पर आज केवल इसी फैसले की चर्चा हैं| चांदनी चौक के एक व्यापारी ने कहा, “हमें पता था कि कुछ नहीं निकलेगा, बस काम रोकने की कोशिश थी|” वहीं, ओखला की एक गृहणी ने ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा कि अब सरकार का ध्यान फिर से बिजली, पानी और मोहल्ला क्लीनिकों पर केंद्रित होगा|
पार्टी मुख्यालय के बाहर जुटी भीड़ को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ा चुनाव जीत लिया गया हो| कार्यकर्ताओं ने ‘जेल के ताले टूट गए, केजरीवाल छुट गए’ के नारे लगाकर आसमान गूंजा दिया|
आगामी चुनौतियाँ: क्या यह अंत है या नई शुरुआत?
भले ही राउज एवेन्यू कोर्ट ने केजरीवाल को क्लीन चिट दे दी हो, लेकिन क़ानूनी रास्ता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ हैं| सीबीई के सूत्रों के अनुसार, वे इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे|
विशेषज्ञों का कहना हैं कि:
- जांच एजेंसियों की साख: इस केस के गिरने से केन्द्रीय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठेंगे, जिसका जवाब उन्हें ऊपरी अदालतों में देना होगा|
- प्रशासनिक बदलाव: केजरीवाल अब दिल्ली सरकार के कामकाज में फिर से पूरी तरह सक्रिय हो जाएंगे, जिससे अटके हुए प्रोजेक्ट्स में तेजी आने की उम्मीद हैं|
अरविंद केजरीवाल का बरी होना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं| यह याद दिलाता हैं कि राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहेगा, लेकिन अंतिम न्याय हमेशा तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही होगा| आज की जीत केवल एक व्यक्ति या एक पार्टी की नहीं, बल्कि उस न्यायिक प्रक्रिया की हैं जो हर नागरिक को निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाती हैं|
अब देखना यह होगा कि केजरीवाल इस नई ‘राजनीतिक ऊर्जा’ का उपयोग 2029 के आम चुनावो में किस तरह करते हैं|
