पटना/नई दिल्ली: बिहार की राजनीति में पिछले 20 वर्षो से एक ही नाम गूंजता रहा हैं-नितीश कुमार| लेकिन आज, 5 मार्च 2026 को, पटना के विधानसभा परिसर में होने वाली एक हलचल ने इस अध्याय के अंत और एक नए युग की शुरुआत का संकेत दे दिया हैं| मुख्यमंत्री नितीश कुमार आज सुबह 11:30 बजे राज्यसभा के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल करने जा रहे हैं|
इस घटनाक्रम के साथ ही बिहार में ‘नितीश युग’ के समापन की औपचारिकताए शुरू हो गई हैं| गृह मंत्री अमिट शाह की मौजूदगी में होने वाला यह नामांकन न केवल नितीश कुमार के व्यक्तिगत राजनीतिक करियर का न्य मोड़ हैं, बल्कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पहले मुख्यमंत्री के मार्ग को भी प्रशस्त कर रहा हैं|
1. राज्यसभा जाने का फैसला: ‘सम्मानजनक विदाई’ या रणनीति?
नितीश कुमार ने हाल ही में अपना 75वां जन्मदिन मनाया हैं| 2025 के विधानसभा चुनाव में NDA को मिली प्रचंड जीत के बाद उन्होंने रिकार्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी| हालांकि, पिछले कुछ महीनों से उनके स्वास्थ्य और सक्रिय राजनीति से उनके ‘मोहभंग’ की ख़बरें चर्चा में थीं|
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना हैं कि नितीश कुमार अब केंद्र में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाना चाहते हैं| राज्यसभा जाना उनके लिए एक ‘सम्मानजनक विदाई’ (Honorable Exit) माना जा रहा हैं| जेडीयू सूत्रों के अनुसार, नितीश कुमार 16 मार्च को राज्यसभा चुनाव के परिणाम आने तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं, जिसके बाद वे इस्तीफा सौंफ देंगे|
2. उत्तराधिकार की योजना: बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री
इस पुरे राजनीतिक ड्रामे का सबसे दिलचस्प पहलु नितीश कुमार के बेटे, निशांत कुमार का सक्रिय राजनीति में प्रवेश हैं| अब तक चकाचौंध से दूर रहने वाले निशांत कुमार को लेकर जेडीयू के भीतर काफी उत्साह हैं|
- डिप्टी सीएम की चर्चा: कयास लगाए जा रहे हैं कि नई सरकार में निशांत कुमार को उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता हैं|
- जेडीयू का भविष्य: पार्टी कार्यकर्ताओं का मानना हैं कि निशांत के आने से पार्टी का ‘लव-कुश’ समीकरण और युवा वोट बैंक एकजुट रहेगा| हालांकि, खुद निशांत ने अब तक किसी भी पद के लिए अपनी इच्छा जाहिर नहीं की हैं, जिससे परिवार के भीतर कुछ वैचारिक मतभेद की खबरें भी सामने आई हैं|
3. बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री?
बिहार में भाजपा हमेशा से ‘छोटे भाई’ की भूमिका में रही हैं, लेकिन 2025 के चुनावों में 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बाद से ही भाजपा के मुख्यमंत्री की मांग तेज थी| नितीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद अब यह सपना सच होता दिख रहा हैं|
- प्रमुख दावेदार: वर्तमान डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे हैं| उनके अलावा केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का नाम भी चर्चा में हैं|
- भाजपा की रणनीति: अमित शाह की पटना यात्रा का मुख्य उद्देश्य भाजपा विधायक दल के साथ बैठक करना और नए नेता के नाम पर मुहर लगाना हैं| पार्टी चाहती हैं कि नया मुख्यमंत्री पिछड़ा या अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) से हो, ताकि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए समीकरण साधे जा सकें|
4. विपक्ष का रुख: तेजस्वी यादव की चुनौती
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव इस स्थिति पर करीब से नजर रख रहे हैं| महागठबंधन (MGB) ने इस पुरे घटनाक्रम को “जनादेश के साथ धोखा” करार दिया हैं| तेजस्वी का तर्क हैं कि जनता ने नितीश कुमार को 5 साल के लिए चुना था, लेकिन वे बीच में ही मैदान छोडकर भाग रहे हैं| विपक्ष राज्यसभा की 5वीं सिट के लिए अपना उम्मीदवार (अमरेन्द्र धारी सिंह) उतारकर एनडीए के भीतर सेंध लगाने की कोशिश में भी जुटा हैं|
5. बिहार के लिए इसके क्या मायने हैं?
नितीश कुमार के हटने से बिहार की ब्यूरोक्रेसी और गवर्नेस मॉडल में बड़े बदलाव की उम्मीद हैं| पिछले 20 सैलून से ‘नितीश मॉडल’ पर चलने वाला बिहार अब ‘डबल इंजन’ की पूरी क्षमता के साथ भाजपा के नेतृत्व में काम करेगा|
- लव-कुश समीकरण में सेंध: नितीश कुमार का मुख्य वोट बैंक ‘कुर्मी-कोईरी’ (लव-कुश) रहा हैं| सम्राट चौधरी (कोईरी/कुशवाहा) को आगे कर भाजपा इस बड़े वोट बैंक को सीधे अपने पाले में लाना चाहती हैं|
- युवा और प्रखर वक्ता: तेजस्वी यादव की काट के लिए भाजपा को एक ऐसा नेता चाहिए था जो आक्रामक हो और पिछड़ों की राजनीति को समझता हो|
2029 लोकसभा चुनाव: ‘ब्रांड नितीश’ के बिना NDA की राह
नितीश कुमार पिछले दो दशकों से बिहार में ‘किंगमेकर’ रहे हैं| उनके पास लगभग 12-15% का साईलेंट वोट बैंक (अति पिछड़ा और महिला वोटर) हैं|
- भाजपा का ‘पूर्ण नियंत्रण’ मिशन: अब तक भाजपा को बिहार में नितीश के ‘दबाव’ में राजनीति करनी पड़ती थी| अब सम्राट चौधरी को आगे करके भाजपा ‘ओबीसी+सवर्ण+दलित’ का एक नया त्रिकोण बना रही हैं| अगर यह सफल रहा, तो 2029 में भाजपा बिहार की 40 में से 35+सीटें जीतने का लक्ष्य रख सकती हैं|
- वोट बैंक का ट्रांसफर: सबसे बड़ा सवाल यह हैं कि क्या नितीश का ‘कुर्मी-कोईरी’ और ‘EBC’ वोट बैंक पूरी तरह भाजपा या निशांत कुमार को ट्रांसफर होगा? अगर इसमें 5%की भी सेंध लगी, तो एनडीए के लिए मुश्किल हो सकती हैं|
- निशांत कुमार का ‘X-Factor’: अगर निशांत कुमार युवाओं को जोड़ने में सफल रहे, तो वे जेडीयू के अस्तित्व को बचा लेंगे| वरना, 2029 तक जेडीयू का भाजपा में विलय (Merger) होने की संभावना भी जताई जा रही हैं|
‘बेरोजगारी’ को बनाया सबसे बड़ा हथियार:
तेजस्वी जानते हैं कि बिहार का युवा अब जाति से ज्यादा ‘नौकरी’ की बात कर रहा हैं| उनकी हालिया ‘रोजगार यात्रा’ में भारी भीड़ उमड़ रही हैं| वे दावा कर रहे हैं कि 17 महीने की सरकार में जो भर्तियाँ उन्होंने निकाली थी, भाजपा-जेडीयू की नई सरकार उसे रोक रही हैं|
‘जाति जनगणना’ और आरक्षण का कार्ड:
बिहार में हुई जाती जनगणना के आंकड़ो को लेकर तेजस्वी अब ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद कर रहे हैं| वे पिछड़ों को यह समझा रहे हैं कि भाजपा (जिसे वे सवर्णों की पार्टी बताते हैं) उनके हक मार लेगी|
‘MY’ से आगे ‘BAAP’ समीकरण:
तेजस्वी अब सिर्फ M (Muslim) और Y (Yadav) तक सीमित नहीं रहना चाहते| उन्होंने BAAP (Bahujan,Agada, Adha, P पिछड़ा) का न्य फार्मूला दिया हैं| वे सवर्णों (Forward Castes) के गरीब तबके को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं ताकि एनडीए के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके|
बिहार का भविष्य क्या हैं?
आने वाले 6 महीने बिहार के लिए ‘लिटमस टेस्ट’ जैसे हैं|
- अगर सम्राट चौधरी शासन व्यवस्था (Law & Order) को सुधारने में सफल रहे, तो भाजपा 2029 में क्लीन स्वीप करेगी|
- लेकिन अगर तेजस्वी यादव ने ‘रोजगार’ और ‘जाति’ के मुद्दे पर युवाओं को लोग्ब्न्द कर लिया, तो बिहार में सत्ता परिवर्तन की लहर भी चल सकती हैं|
